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भदावर राष्ट्रगान

आन-बान है शान जगत की, दुनिया में सरनाम  भिण्ड-भदावर की धरती को, बारम-बार प्रणाम  चम्बल, क्वांरी, यमुना बहके, अमृत पिलवाती  इनके घाटो की हरयाली, सबके मन भाति  सुबह लुटाती चांदी-सोना, हीरे-मोती शाम -२  भिण्ड-भदावर की धरती को, बारम-बार प्रणाम  किला अटेर है बदन सिंह का राजवंश के खाते  मंदिर बने बटेसुर जिसपर प्रजा शीष झुकाती  वीरो की गाथा दोहराता, है भदौरिया नाम -२  भिण्ड-भदावर की धरती को, बारम-बार प्रणाम  भिण्ड शहर में भिन्डी ऋषि का बना हुआ है मंदिर  वनखण्डेश्वर, गौरी सरोवर शिद्ध मंदिर है सुन्दर इतिहासों में लिखा हुआ है इनका अपना काम -२  भिण्ड-भदावर की धरती को, बारम-बार प्रणाम  आन-बान है शान जगत की, दुनिया में सरनाम  भिण्ड-भदावर की धरती को, बारम-बार प्रणाम ------------ भदावर राष्ट्रगान MP3 डाउनलोड करे  : मोबाइल रिंगटोन बनाये  -----------------

भदावर - लोक-गीतकार

भ दावर प्रदेश में नैसर्गिक सौंदर्य कूट कूट के भरा है यमुना और चम्बल के खारों में उगते बबूल , छेंकुर , हिंसिया , रेमजा आदि के वृक्ष रहस्यमई वातावरण का सृजन करते है तभी तो चौबे लक्ष्मीनारायण गा उठते है - भव्य भदावर धन्य धन्य तब भूमि पुरातन , जहाँ चम्बल लहरात बहति जमुना अति पावन। जित देखो बन विकट रेत चहुँ दिस धूल छाई , बेहड़ की शोभा अपार कछु बरनि न जाई। कहुँ ऊँचे है व्योम बादरन सों बतरावत , कहुँ नीचे धंसि धुव पाताल की सैर दिखावत। हरे भरे जे दिव्य वृक्ष आरोपित कीन्हे , सब तुम भय सों सूख प्राण अपने तनि दीन्हें।

लंगुरिया :भदावर की माटी की सौंधी-सौंधी गंध

लंगुरिया : भदावर में गाया जाने वाला लोकगीत है भदावर के लोकगीत लंगुरिया में चंबल की माटी की सौंधी-सौंधी गंध महकती है। लांगुरिया भजन  करौली की कैलादेवी की स्तुति में गाए जाते है लांगुरिया - काल-भैरव जो कैलादेवी का गण है को सम्बोधित करते हुए गाए जाते हैं। भैरव शब्द का अर्थ ही होता है - भीषण, भयानक, डरावना, भैरव को शिवपुत्र भी माना जाता है। भदावर की मिटटी पर यह भीषण, भयानक, डरावना काल-भैरव भी लांगुर-लांगुरिया बन, करौली की कैलादेवी के मंदिर तक पदयात्रियो के साथ-साथ नाचता हुआ चलता है महिला एवं पुरूष उससे संवाद करते करते सफ़र की थकान भूल जाते है। महिला एवं पुरूष बडे ही भक्तिभाव से कैलादेवी और लांगुरिया को रिझाने के लिए लोकगीत गाते हैं। भदावर के गाँव-गाँव से ध्वज पताकाओं, नेजों के साथ छोटे-छोटे मंदिर वाहनों पर सजाकर गाते-बजाते, नाचते-कूदते भावविभोर होकर करौली मां के दरबार में अपनी मुरादें पूरी करने के लिए चल पड़ते है तथा मार्ग में लांगुरिया को सम्बोधित करते हुए गा उठते है :-    करिहां चट्ट पकरि के पट्ट नरे में ले गयो लांगुरिया॥ टेक॥ आगरे की गैल में दो पंडा रांधे खीर...