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भदावरी कहावते - 6

याद दया विपरीत है, लाभ भला करि लेउ,माया की यह नर्तकी, करि कीर्तन सेउ !!!#भदावरी_कहावत: अपने ईस्ट देव की यदि कृपा चाहि... Posted by Jagdev Singh Bhadauria on  Friday, September 25, 2015

भदावरी ग्रामीण कहावतें: व्यक्तिगत गुणों की परख और मजेदार कहावतें !

भदावरी ग्रामीण कहावतें पुराने बुजुर्गों की कहावतें में कमाल की परख मिलती है मनुष्य की शारीरिक रचना से उसके व्यतिगत गुणों को परखती ये कहावत सौ में सत्तर आदमी पर सटीक बैठती है ये हिंदी कहावत अभद्र कहावतें की श्रेणी की लग सकती है इस कहावत  में गूढ़ अर्थ के साथ कुछ शरारत भी नजर आती है और ये कहावत मजेदार कहावतें हो सकती हैं : सौ में सूर सहस में काना, सवा लाख में ऐचकताना, ऐंचकताना करे पुकार, कंजा से रहियो हुशियार, जाके हिये न एकहु बार, ताको कंजा ताबेदार, छोट गर्दना करे पुकार, कहा करे छाती को बार, अथार्त : एक अंधा सौ नेत्र वालो के बराबर व एक काना हजार के बराबर होता है। अंधे के प्रति स्वाभाविक दया भाव के कारण अँधा अगर चाहे तो सौ लोगो को छल सकता है, उसी प्रकार काने व्यक्ति में हजार लोगो को चलने की कुव्वत होती है। जब ध्यान केंद्रित करना होता है तो एक आँख बंद की जाती है, जैसे बन्दुक से निशाना लगाने के लिए, ये गुण काने में स्वाभाविक रूप में विधमान होता है तो वह हजार लोगो को अपने अनुसार चला सकता है। बात काटने वाले व्यक्ति को ऐंचकताना कहा जाता है, इस प्रकार का व्यक्ति अनुभवी होता है और सभी क्षेत्...

भदावरी कहावते -4

" नंगा कों मिली पीतर , बाहर धरे की भीतर ॥" अर्थात: ये कहावत इंसानी दिखावा परस्त व्यवहार को उजागर करती है किसी गरीब को जब पीतल के वास्तु मिल जाती है या कोई कीमती वास्तु प्राप्त होती है तो वह निश्चित है नहीं  कर पता की लोगो को दिखने के लिए उस वस्तु को किस जगह रक्खे। " नंगन के गड़ई भाई , बार - बार हगन गई ॥" एक गॉंव के दरिद्र व्‍यक्ति , जिसके पास कुछ भी नहीं था उसको अचानक एक गड़ई या लोटा -जल रखने व़ह परेशानी में था कि अब कैसे गॉंव के लोगों को यह पात्र दिखाकर अपनी धाक जमाये । तो वह बार- का पात्र मिल जाता है। अब चूँकि वह व्‍यक्ति तो दरिद्रता की वज़हसे ही प्रसिद्ध था , अत: बार पात्र में जल भरकर शौच केलिए जाता , जिससे लोगों को पता चल जाए कि दरिद्र के पास एक पात्र है। अर्थात किसी मनुष्‍य के पास जब कोई वस्‍तु आती है , तो वह दुनिया को उस वस्‍तु को दिखाने के सौ-सौ बहाने ढूंढता है। अब देखिए , वह दरिद्र व्‍यक्ति जिसके पास खाने-पीने की व्‍यवस्‍था तक नहीं है , वह पात्र लेकर बार-बार शौच के लिए जाता है ? सिर्फ़ प्रदर्शन के लिए !

भदावरी कहावते -3

कागज केडा पान मह दासी दुर्जन बाम , दस दाबे रस देत है रहुआ महुआ आम।। अर्थात : कागज को दबा कर यानी सुरक्षित रखने पर वक्त पर काम देगा , केले को बन्द स्थान मे रखने से मीठा बना रहेगा , पान को मुंह मे दबा कर रखने से रस देता रहेगा , मह यानी खुशबू को बंद रखने से वह बनी रहेगी , सेवको को धन और सम्मान से दबाकर रखने से वह भला बना रहेगा , दुष्ट व्यक्ति को दबा कर रखने से वह भला करता रहेगा शादी के बाद पत्नी को कुल रीतियों से दबाकर रखने से वह संस्कारी बनीं रहेगी , अन्जान रहुआ यानी अन्जान व्यक्ति को नजर मे रखने से और खुला नही छोडने से तथा महुआ जो मीठा रस देता है उसे दबाने से ही रस मिलता है आम को भी दबाने से रस मिलता है।     जिनके पशु प्यासे बंधे , त्रियां करें कलेश , उनकी रक्षा ना करें , ब्रह्मा विष्णु महेश ।। अर्थात : जिसके दरवाजे पर पशु प्यासे बंधे हुये है और घर की महिलायें क्लेश में रहती है तो उस घर की रक्षा ब्रह्मा विष्णु महेश कोई भी नही कर सकता है , उस घर को तो बरबाद होना ही है । एक लाख पूत सवा लाख नाती , ता रावण घर दिया न बाती॥   इस का अर्थ बताने के जरुरत ही नहीं ...

भदावरी कहावते - 2

महाभारत काल से ही भदावर अपनी भौगोलिक स्तिथि के करण भील-डाकुओं का स्थाई निवास बना रहा था । महाभारत (मूसलपर्व 15/22) में कथा आती है की कृष्ण के प्रस्थान के बाद बटेश्वर-सौरिपुर में बचे-कुछे बच्चो व स्त्रियों को लेकर जब धनुर्धर अर्जुन जा रहे थे तो भीलों ने अर्जुन को स्त्रियों सहित लूट लिया था । अर्जुन का गांडीव भी स्त्रियों- बच्चो की रक्षा ना कर सका था गांडीव धारी अर्जुन की ये पराजय लोकजीवन आज भी नहीं भुला है । भदावर में आज भी कहावत कही जाती है - " सबे दिन रहत न एक समान भीलन लूटीं गोपिका बेई अर्जुन बेई बान " प्राचीन भदावरी कहावतें जिनके गूढ अर्थ को अगर समझा जाये तो वे अपने अपने अनुसार बहुत ही सुन्दर कथन और जीवन के प्रति सावधानी को उजागर करती थी। इसी प्रकार से एक कहावत इस प्रकार से कही जाती है ।

भदावरी कहावते - 1

भ दावरी कहावते अपने पैने, प्रभावशाली और सशक्त संकेतों से इस छेत्र के जनसमुदाय का युगों–युगों से मार्ग निर्देशन करती आ रही है।  ये कहावते सोए को जगाती है, आलसियों को झकझोरती है, मूर्खों को समझाती है बच्चों को दुलारती है धूतों को डांटती है, बेईमानों पर उंगली उठाती है पथभ्रष्टों को हड़काती है और पाखण्ड पर कठोर प्रहार करती है । सुन्दर नीति से कही गयी उक्ति को सूक्ति कहते है। ऐसी ही उक्तिंयां लोक व्यवहार और जन सामान्य के प्रयोग मे आकर लोकोक्तियों या कहावते बन जाती है। किसी तथ्य के खण्डन या पुष्टि अथवा विरोध या समर्थन के लिए रामवाण बन जाती है। लोक कण्ठों पर थिरकती कहावते लोक व्यवहार के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़ी होती है और कहावतो का विशिष्ट लाक्षणिक अर्थ ही ग्रहण किया जाता है। भदावर में "खीर मे सांझे महेरी में न्यारे ।।" रहने वालों को तुरन्त परख लिया जाता है। लोक व्यवहार को परखती ये कहावते आगे बढती है तो छोटा परिवार सुखी परिवार होता है लेकिन जहां इस नियम का पालन नही होता है उस घर की लक्ष्मी दीवाल तोड़कर निकल जाती है। "सास बहु की एकई सोर, लच्छो कड़ गई पाखौ फोर।। ...